राँची:- झारखंड की राजधानी रांची स्थित पारस एचईसी हॉस्पिटल ने एक बार फिर उन्नत नवजात चिकित्सा सेवाओं का उदाहरण पेश करते हुए 21 दिन की एक नवजात बच्ची की जान बचाकर चिकित्सा जगत में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। गंभीर हालत में अस्पताल लाई गई इस बच्ची को तेज पीलिया, सांस लेने में परेशानी और शॉक जैसी जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। डॉक्टरों के अनुसार शुरुआती लक्षणों को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि बच्ची किसी गंभीर संक्रमण या सेप्सिस से पीड़ित है, जिससे परिजन बेहद चिंतित और आशंकित हो गए थे।
हालांकि, डॉक्टरों ने बिना किसी देरी के विस्तृत जांच प्रक्रिया शुरू की। प्रो-कैल्सिटोनिन टेस्ट, ब्लड कल्चर और यूरिन कल्चर रिपोर्ट सामने आने पर यह स्पष्ट हुआ कि बच्ची में किसी भी प्रकार का संक्रमण नहीं है। सभी रिपोर्ट नेगेटिव आने के बाद डॉक्टरों ने पीलिया के वास्तविक कारण की गहराई से जांच की। इसी क्रम में पता चला कि बच्ची दुर्लभ जी6पीडी डेफिशिएंसी से पीड़ित है, जो आमतौर पर लड़कों में अधिक पाई जाती है और लड़कियों में इसका सामने आना बेहद दुर्लभ माना जाता है।
इसके साथ ही इकोकार्डियोग्राफी जांच में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। बच्ची के हृदय में लगभग 10 मिलीमीटर का बड़ा एओर्टोपल्मोनरी विंडो नामक जन्मजात दोष पाया गया। यह बीमारी इतनी दुर्लभ होती है कि लगभग एक लाख जीवित जन्मों में से केवल एक में ही ऐसा मामला सामने आता है। इस दोष में हृदय से शरीर को रक्त पहुंचाने वाली महाधमनी और फेफड़ों तक रक्त ले जाने वाली धमनी के बीच असामान्य छेद बन जाता है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन युक्त रक्त की आपूर्ति प्रभावित होती है।
सही समय पर बीमारी की पहचान होने के बाद इलाज की दिशा पूरी तरह बदली गई। चिकित्सकीय टीम ने योजनाबद्ध तरीके से बच्ची की हालत को नियंत्रित किया। धीरे-धीरे उसे HFOV से हटाकर सामान्य वेंटिलेशन पर लाया गया, इनोट्रोप सपोर्ट बंद किया गया और बच्ची को पूरी तरह फीड पर रखा गया। इलाज का सकारात्मक असर दिखने लगा और कुछ ही दिनों में उसकी स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ। पूरी तरह स्थिर होने के बाद डॉक्टरों ने बच्ची को आगे की हृदय सर्जरी के लिए एक विशेष केंद्र में रेफर कर दिया।
इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. निशांत पाठक ने कहा कि यह केस इस बात का उदाहरण है कि हर सेप्सिस जैसा दिखने वाला मामला संक्रमण से ही जुड़ा हो, यह जरूरी नहीं है। कई बार दुर्लभ बीमारियां भी उसी तरह के लक्षण दिखाती हैं और यदि समय पर सही जांच न हो तो परिणाम घातक हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि विस्तृत जांच और त्वरित निर्णय ने इस नवजात की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई।
वहीं अस्पताल के फैसिलिटी डायरेक्टर डॉ. नीतेश कुमार ने बताया कि पारस एचईसी हॉस्पिटल में अत्याधुनिक नवजात आईसीयू, उच्च स्तरीय जांच सुविधाएं और अनुभवी डॉक्टरों की टीम उपलब्ध है। यही कारण है कि जटिल से जटिल मामलों का भी समय रहते सफल उपचार संभव हो पा रहा है। उन्होंने कहा कि अस्पताल भविष्य में भी इस तरह की उन्नत चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है।
इलाज के बाद बच्ची के परिजनों ने अस्पताल प्रशासन और चिकित्सकीय टीम के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि जिस समय वे उम्मीद खो चुके थे, उस समय डॉक्टरों की सूझबूझ और मेहनत ने उनकी बच्ची को नया जीवन दिया। यह मामला न केवल चिकित्सा क्षेत्र के लिए प्रेरणादायक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि आधुनिक तकनीक और अनुभवी चिकित्सकों की भूमिका कितनी अहम होती है।









