झारखंड में निर्माण कार्यों पर इस समय गंभीर संकट मंडरा रहा है। बिटुमिन की कमी और इसकी कीमतों में अचानक आई भारी वृद्धि ने सड़क निर्माण सहित कई परियोजनाओं को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। इसी मुद्दे को लेकर फेडरेशन ऑफ झारखंड चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज और बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, झारखंड चैप्टर ने संयुक्त रूप से एक प्रेस वार्ता आयोजित की।
उन्होंने यह भी बताया कि झारखंड में केवल बोकारो में कंटेनर डिपो होने के बावजूद वहां पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो पा रही है। इस वजह से बिटुमिन को हल्दिया से मंगाना पड़ता है, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ रहे हैं। उन्होंने राज्य में नए कंटेनर डिपो खोलने की मांग करते हुए कहा कि इससे आपूर्ति सुचारू हो सकेगी और निर्माण कार्यों में तेजी आएगी।
प्रेस वार्ता में यह भी सामने आया कि कॉमर्शियल डीजल की कीमतों में लगभग 22 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि से लॉजिस्टिक्स लागत में भारी इजाफा हुआ है। इसका असर केवल निर्माण क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य संबंधित सेक्टर भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। वर्तमान स्थिति में सड़क निर्माण कार्य लगभग 50 प्रतिशत तक सिमट कर रह गया है।
बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, झारखंड चैप्टर के चेयरमैन रविराज अग्रवाल ने बताया कि पिछले तीन महीनों से राज्य के संवेदकों को बोकारो स्थित IOC, BPCL और HPCL डिपो से बिटुमिन नहीं मिल रहा है। हल्दिया से भी आपूर्ति बाधित है, जिससे निर्माण कार्य पूरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि हर साल फरवरी-मार्च के दौरान कार्य के समय ही बिटुमिन की कृत्रिम कमी पैदा हो जाती है, जिससे संवेदकों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। पिछले तीन महीनों में बिटुमिन की कीमत में करीब 15 हजार रुपये प्रति टन की वृद्धि हुई है। इसके अलावा इलेक्ट्रिकल सामान और वायर के दाम भी डेढ़ गुना तक बढ़ गए हैं।
रविराज अग्रवाल ने मांग की कि कीमतों में वृद्धि का भार सरकार वहन करे और राज्य में ऑयल कंपनियों के बल्क बिटुमिन डिपो स्थापित किए जाएं। इससे झारखंड की हल्दिया पर निर्भरता खत्म होगी और राज्य को एसजीएसटी का भी लाभ मिलेगा।
बिल्डर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधि अशोक प्रधान ने कहा कि फरवरी से अब तक बिटुमिन की कीमतों में 30 से 35 प्रतिशत तक वृद्धि हो चुकी है। राज्य में एक भी बल्क बिटुमिन डिपो नहीं होने के कारण भुगतान के बावजूद सामग्री उपलब्ध नहीं हो पा रही है।
उन्होंने यह भी बताया कि झारखंड गठन के 26 वर्षों बाद भी राज्य में एक भी रिफाइनरी नहीं है। उन्होंने रांची में हल्दिया की तर्ज पर टर्मिनल डिपो स्थापित करने की मांग की। साथ ही उन्होंने यह मुद्दा भी उठाया कि रिलायंस जैसी कंपनियों के उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों को झारखंड में मंजूरी नहीं दी गई है, जिससे विकल्प सीमित हो जाते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले छोटे संवेदकों पर इस संकट का सबसे अधिक असर पड़ा है। 5 से 7 प्रतिशत मार्जिन पर काम करने वाले ये संवेदक अब भारी आर्थिक दबाव में आ गए हैं।
प्रेस वार्ता के माध्यम से संगठनों ने सरकार से मांग की है कि जिस तरह देश में क्रूड ऑयल का 90 दिनों का भंडारण रखा जाता है, उसी तरह राज्य स्तर पर भी बिटुमिन का रिजर्व तैयार किया जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की समस्या से बचा जा सके।









