राँची:- प्रदेश कांग्रेस महासचिव आलोक कुमार दूबे ने मनरेगा की स्थापना और इसके ग्रामीण भारत पर प्रभाव को रेखांकित करते हुए कहा कि 23 अगस्त 2005 का दिन भारतीय लोकतंत्र और ग्रामीण भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ग्रामीण परिवारों को रोजगार का कानूनी अधिकार देने वाला ऐतिहासिक कानून पारित किया था। फरवरी 2006 से इसके क्रियान्वयन की शुरुआत हुई।
आलोक कुमार दूबे ने कहा कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का उद्देश्य केवल ग्रामीण मजदूरों को मजदूरी उपलब्ध कराना नहीं था, बल्कि ग्रामीण परिवारों की आजीविका सुरक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता को मजबूत करना भी था। कानून के तहत मांग करने वाले ग्रामीण परिवारों के वयस्क सदस्यों को एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों के अकुशल मजदूरी रोजगार की कानूनी गारंटी दी गई।
उन्होंने कहा कि मनरेगा के माध्यम से रोजगार उपलब्ध कराने के साथ-साथ गांवों में जल संरक्षण, सिंचाई, भूमि विकास, ग्रामीण संपर्क मार्ग, तालाब और अन्य टिकाऊ परिसंपत्तियों के निर्माण को भी बढ़ावा मिला। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन के साथ स्थानीय स्तर पर आधारभूत संरचना विकसित करने में मदद मिली।
2006-07 से 2013-14 के बीच 1,660 करोड़ व्यक्ति-दिवस रोजगार का दावा
कांग्रेस नेता ने सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 2006-07 से 2013-14 के बीच मनरेगा के तहत 1,660 करोड़ व्यक्ति-दिवस रोजगार सृजित हुए। उन्होंने बताया कि वर्ष 2009-10 में करीब 4.90 करोड़ ग्रामीण परिवारों को रोजगार मिला और लगभग 251 करोड़ व्यक्ति-दिवस रोजगार सृजित हुआ। उनके अनुसार, इस अवधि में मनरेगा की औसत दैनिक मजदूरी 2006-07 में 65 रुपये से बढ़कर 2009-10 में करीब 90 रुपये हो गई थी।
आलोक दूबे ने कहा कि वर्ष 2010-11 में भी करीब 4.1 करोड़ परिवारों को मनरेगा के तहत रोजगार मिला। उन्होंने दावा किया कि उस समय मनरेगा में महिलाओं की भागीदारी लगभग 47 प्रतिशत रही, जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के श्रमिकों की हिस्सेदारी क्रमशः 28 प्रतिशत और 24 प्रतिशत दर्ज की गई थी।
उन्होंने कहा कि मनरेगा के माध्यम से बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवारों के बैंक खातों तक मजदूरी पहुंची और इससे ग्रामीण वित्तीय समावेशन को भी बढ़ावा मिला। उनके अनुसार, करीब 10 करोड़ लाभार्थी खातों के खुलने से ग्रामीण आबादी को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने में मदद मिली।
आर्थिक संकट और कोरोना काल में बना सुरक्षा कवच : आलोक दूबे
आलोक कुमार दूबे ने कहा कि 2008-09 की वैश्विक आर्थिक मंदी से लेकर कोरोना महामारी जैसे संकट के दौर में मनरेगा ने ग्रामीण भारत के लिए आर्थिक सुरक्षा कवच के रूप में काम किया। उनके मुताबिक, जब रोजगार के अन्य अवसर सीमित हुए, तब मनरेगा के माध्यम से ग्रामीण परिवारों तक मजदूरी पहुंचाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मांग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई गई।
उन्होंने कहा कि मनरेगा को केवल एक सरकारी योजना के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह ग्रामीण गरीबों के लिए ‘काम के अधिकार’ और गरिमा से जुड़ा सामाजिक सुरक्षा तंत्र है। इसके माध्यम से रोजगार के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण, सिंचाई और अन्य सार्वजनिक परिसंपत्तियों के निर्माण को भी गति मिली।
2014-15 से 2024-25 के बीच 2,923 करोड़ व्यक्ति-दिवस रोजगार
कांग्रेस महासचिव ने कहा कि ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2006-07 से 2013-14 तक 1,660 करोड़ व्यक्ति-दिवस रोजगार सृजित हुआ, जबकि 2014-15 से 2024-25 तक 2,923 करोड़ व्यक्ति-दिवस रोजगार सृजित हुआ। उन्होंने इन आंकड़ों को मनरेगा की लगातार बनी उपयोगिता का संकेत बताया।
मनरेगा को कमजोर करने का लगाया आरोप
आलोक कुमार दूबे ने भाजपा सरकार पर मनरेगा की मूल भावना और रोजगार की कानूनी गारंटी को कमजोर करने की दिशा में कदम उठाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस द्वारा ग्रामीण गरीबों को दिए गए ‘काम के अधिकार’ को कमजोर करना देश के करोड़ों ग्रामीण मजदूरों के हितों पर सीधा प्रहार है।
उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि मनरेगा की मूल भावना को मजबूत किया जाए और ग्रामीण परिवारों को रोजगार की गारंटी, समय पर मजदूरी तथा आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
झारखंड में मनरेगा को लेकर सरकार प्रतिबद्ध : आलोक दूबे
आलोक कुमार दूबे ने कहा कि झारखंड में गठबंधन सरकार भी मनरेगा कानून की मूल भावना को पूरी तरह लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण विकास मंत्री श्रीमती दीपिका पांडेय सिंह के नेतृत्व में राज्य में मनरेगा के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराने, ग्रामीण परिसंपत्तियों का निर्माण करने और गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का काम लगातार किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि सरकार का प्रयास है कि जरूरतमंद ग्रामीण परिवारों को उनके अधिकार के तहत रोजगार मिले और मनरेगा केवल सरकारी कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि गांव के गरीब और मजदूर परिवारों के जीवन में वास्तविक बदलाव का माध्यम बने।
उन्होंने कहा कि मनरेगा कांग्रेस की ऐसी ऐतिहासिक पहल है, जिसने गांव के गरीब को केवल सहायता पाने वाला व्यक्ति नहीं माना, बल्कि उसे अपने श्रम के माध्यम से सम्मानपूर्वक आय अर्जित करने का कानूनी अधिकार दिया।
आलोक कुमार दूबे ने कहा कि ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से मनरेगा आज भी महत्वपूर्ण है और इसके मूल उद्देश्य—रोजगार की गारंटी, समय पर मजदूरी और ग्रामीण परिवारों की आजीविका सुरक्षा—को मजबूत किया जाना आवश्यक है।









