करमा पूजा की बदली तस्वीर: अरगोड़ा चापू टोली में परंपरा से आधुनिकता तक का सफर

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राँची:- राजधानी रांची के अरगोड़ा चापू टोली में करमा पूजा का आयोजन आस्था, परंपरा और प्रकृति के प्रति सम्मान के संदेश के साथ किया गया। करमा पर्व झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और प्रकृति से जुड़े जीवन दर्शन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस अवसर पर स्थानीय लोगों ने करमा पूजा की परंपरा, इसके धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व और बदलते समय के साथ इसके स्वरूप में आए बदलाव को लेकर अपनी बात रखी।

स्थानीय लोगों के अनुसार करमा पूजा सिर्फ एक पर्व नहीं है, बल्कि प्रकृति के साथ इंसान के रिश्ते को समझने और उसे सम्मान देने का माध्यम भी है। आदिवासी समाज की परंपराओं में प्रकृति का विशेष महत्व रहा है। पेड़-पौधे, जंगल, जल और जमीन को जीवन का आधार मानते हुए प्रकृति के संरक्षण का संदेश पीढ़ियों से आगे बढ़ाया जाता रहा है। स्थानीय लोगों ने कहा कि प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी मानव जीवन और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रह सकता है।

अरगोड़ा चापू टोली में करमा पूजा पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार संपन्न कराई जाती है। पूजा की प्रक्रिया में पाहन की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। करमा पर्व से जुड़ी कथा और पारंपरिक मान्यताओं को उपासकों के बीच साझा किया जाता है और इसी के माध्यम से पर्व के महत्व को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है।

स्थानीय लोगों ने बताया कि करमा पूजा की परंपरा यहां लंबे समय से चली आ रही है। पहले करमा पर्व के दौरान मांदर, ढोलक और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप के साथ गीत और नृत्य आयोजन का प्रमुख हिस्सा हुआ करते थे। लोग सामूहिक रूप से पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य के जरिए पर्व मनाते थे। लेकिन समय के साथ शहर का विस्तार और लोगों की बदलती जीवनशैली करमा पूजा के आयोजन पर भी दिखाई देने लगी है।

समय के साथ पारंपरिक संगीत के अभ्यास में कमी आई है और आधुनिक साउंड सिस्टम तथा डीजे का इस्तेमाल भी कई आयोजनों में देखने को मिलता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह बदलाव समय के साथ आया है, लेकिन इसके बावजूद करमा पूजा की मूल भावना और प्रकृति के प्रति आस्था को बनाए रखना जरूरी है। उनके अनुसार आधुनिकता के साथ आगे बढ़ते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों को नहीं भूलना चाहिए।

करमा पूजा के दौरान बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों की भागीदारी भी देखने को मिलती है। पर्व लोगों को एक साथ जोड़ने और सामुदायिक एकजुटता को मजबूत करने का अवसर देता है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इस आयोजन का हिस्सा बनते हैं। इस तरह करमा पूजा धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक मेल-जोल का भी माध्यम बनती है।

करमा पूजा से जुड़े स्थानीय निवासी राजू तिर्की ने बताया कि इस पर्व की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। उन्होंने कहा कि समय के साथ आयोजन के स्वरूप में बदलाव आया है, लेकिन प्रकृति के प्रति सम्मान और अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाने की भावना आज भी कायम है। उन्होंने लोगों से प्रकृति की रक्षा करने और अपनी पारंपरिक संस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की अपील की।

करमा पर्व का यह आयोजन यह भी दिखाता है कि समय के साथ किसी परंपरा का बाहरी स्वरूप बदल सकता है, लेकिन उसकी मूल भावना समाज को जोड़ने और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देने में कायम रह सकती है। अरगोड़ा चापू टोली में आयोजित करमा पूजा इसी सांस्कृतिक निरंतरता की एक तस्वीर पेश करती है, जहां पुरानी परंपराओं के साथ आधुनिक समय की झलक भी दिखाई देती है।

करमा पूजा के माध्यम से प्रकृति संरक्षण, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकजुटता का संदेश सामने आया। बदलते दौर में इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और इसके मूल सांस्कृतिक महत्व को समझाना समाज की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

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Author: Ranchi Club Tv

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