राँची:- प्रदेश कांग्रेस महासचिव आलोक कुमार दूबे ने नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि झारखंड में हिंदू-मुस्लिम, बाहरी-भीतरी, गोरा-काला, आदिवासी-क्रिश्चियन और क्षेत्रीयता के नाम पर समाज को बांटकर राजनीति करने का दौर अब खत्म हो चुका है। उन्होंने कहा कि झारखंड का जागरूक समाज अब विकास, अधिकार, रोजगार, शिक्षा और सम्मान की राजनीति चाहता है।
आलोक दूबे ने कहा कि बाबूलाल मरांडी बार-बार आदिवासी समाज के भविष्य और जनसंख्या को लेकर भय का वातावरण पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बाबूलाल मरांडी को अपने विचार रखने का अधिकार है, लेकिन उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे झारखंड में आदिवासियों के लिए आरक्षित विधानसभा और लोकसभा सीटों की संख्या घटाने के पक्ष में हैं या बढ़ाने के। उन्होंने कहा कि यही असली सवाल है, जिसका सीधा जवाब बाबूलाल मरांडी को देना चाहिए।
अलग झारखंड राज्य के आंदोलन पर भी उठाए सवाल
आलोक दूबे ने कहा कि बाबूलाल मरांडी को झारखंड के इतिहास को भी याद करना चाहिए। उनके अनुसार, झारखंड की निर्णायक लड़ाई में कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद के गठन की प्रक्रिया ने अलग राज्य की मांग को संस्थागत राजनीतिक आधार दिया और 1995 में झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद अस्तित्व में आई।
उन्होंने कहा कि झारखंड आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में अनेक सामाजिक, राजनीतिक और क्षेत्रीय नेताओं ने संघर्ष किया। अलग राज्य की मांग को लेकर कांग्रेस के नेता स्वर्गीय ज्ञान रंजन और टी. मुचिराय मुंडा सहित झारखंड आंदोलन से जुड़े लोगों ने केंद्र और बिहार सरकार पर लगातार दबाव बनाया।
आलोक दूबे ने बाबूलाल मरांडी से सवाल करते हुए कहा कि अलग झारखंड राज्य के आंदोलन में भाजपा ने किस दौर में क्या निर्णायक भूमिका निभाई, इसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि झारखंड के कांग्रेस विधायक एकीकृत बिहार में मंत्री रहे और उन्होंने अपने मंत्री पद को त्यागकर अलग राज्य के निर्माण में भूमिका निभाई।
जनगणना के आंकड़ों को राजनीतिक चश्मे से न देखने की अपील
आलोक दूबे ने कहा कि बाबूलाल मरांडी जिस तरह जनसंख्या के आंकड़ों को लेकर बयान दे रहे हैं, उसमें यह समझना जरूरी है कि भारत की आखिरी पूर्ण जनगणना 2011 में हुई थी। झारखंड के धार्मिक समुदायों से संबंधित आधिकारिक आंकड़े भी 2011 की जनगणना पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि नई पूर्ण जनगणना के आंकड़े उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में वर्तमान जनसंख्या के बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना वैज्ञानिक और सांख्यिकीय रूप से उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि पाकुड़ जैसे जिलों के 2001 और 2011 के आंकड़ों को लेकर राजनीतिक व्याख्या की जा रही है। उनके मुताबिक आबादी के प्रतिशत में बदलाव को सीधे घुसपैठ या किसी एक समुदाय की साजिश का प्रमाण मान लेना गंभीर सांख्यिकीय सरलीकरण होगा। उन्होंने कहा कि जनसंख्या में बदलाव के पीछे जन्म-दर, मृत्यु-दर, आयु संरचना, प्रवासन, क्षेत्रीय जनसांख्यिकी और गणना पद्धति सहित कई कारक हो सकते हैं।
आलोक दूबे ने कहा कि पुराने जनगणना आंकड़ों को भय और धार्मिक ध्रुवीकरण का हथियार बनाकर आदिवासी समाज को डराने की राजनीति अब नहीं चलेगी।
आदिवासी समाज को लेकर भाजपा पर साधा निशाना
आलोक दूबे ने दावा किया कि विधानसभा और लोकसभा चुनावों में आदिवासी समाज ने भाजपा की राजनीति को नकार दिया है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज पहले से अधिक जागरूक, संगठित और राजनीतिक रूप से सजग है तथा उसे अपने जल, जंगल, जमीन, आरक्षण, संवैधानिक अधिकार और सम्मान से जुड़े सवालों की समझ है।
उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासी समाज की वर्तमान एकजुटता से भाजपा के भीतर बेचैनी पैदा हुई है और इसी वजह से कभी बाहरी-भीतरी, कभी हिंदू-मुस्लिम और अब आदिवासी-ईसाई के नाम पर समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश की जा रही है।
आलोक दूबे ने कहा कि आदिवासी, क्रिश्चियन और मुस्लिम का मुद्दा उठाकर राजनीति नहीं चलेगी। झारखंड की जनता अब भाषण के बजाय राजनीतिक दलों की नीयत और काम देखना चाहती है।
बाबूलाल मरांडी से आरक्षित सीटों पर मांगा स्पष्ट जवाब
आलोक दूबे ने परिसीमन और आदिवासी प्रतिनिधित्व के सवाल पर बाबूलाल मरांडी की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। उन्होंने कहा कि झारखंड विधानसभा में वर्तमान में अनुसूचित जनजाति के लिए 28 सीटें आरक्षित हैं, जबकि लोकसभा में 5 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। प्रस्तावित परिसीमन को लेकर आदिवासी संगठनों के बीच प्रतिनिधित्व कम होने को लेकर चिंता जताई जा रही है।
उन्होंने कहा कि बाबूलाल मरांडी अपने सभी हाइपोथेटिकल विचार रख सकते हैं और जनसंख्या के आंकड़ों पर अपनी बात रख सकते हैं, लेकिन उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए कि झारखंड में आदिवासियों की आरक्षित सीटें घटनी चाहिए या बढ़नी चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि यदि आदिवासी समाज की संख्या और हिस्सेदारी को लेकर चिंता है तो उसके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मजबूत करने की बात क्यों नहीं की जाती।
आलोक दूबे ने कहा कि आदिवासी समाज अब चुप बैठने वाला नहीं है। उनके अनुसार समाज यह देख रहा है कि कौन उसके अधिकारों की रक्षा की बात करता है और कौन चुनावी लाभ के लिए उसके नाम पर भय और भ्रम पैदा करता है।
धर्म और क्षेत्रीय विभाजन की राजनीति पर निशाना
उन्होंने कहा कि झारखंड की राजनीति को फिर से धर्म, जाति और क्षेत्रीय विभाजन के पुराने रास्ते पर ले जाने की कोशिश सफल नहीं होगी। झारखंड की जनता ने लंबे संघर्ष के बाद यह राज्य हासिल किया है और अब वह अपने अधिकारों, विकास और सामाजिक सौहार्द से समझौता नहीं करना चाहती।
आलोक दूबे ने अंत में कहा कि भाजपा को यह समझ लेना चाहिए कि झारखंड में नफरत और विभाजन की राजनीति की उम्र पूरी हो चुकी है और आदिवासी समाज ने अपनी राजनीतिक दिशा तय कर ली है।
डिस्क्लेमर: इस खबर में दिए गए राजनीतिक आरोप, दावे और बयान संबंधित कांग्रेस नेता आलोक कुमार दूबे के हैं। Ranchi Club TV इन आरोपों या दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है। खबर में संबंधित पक्ष का बयान उपलब्ध होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।









