झारखंड का काला सच ! अवैध कोयला खनन की सुरंगों में दफन होती ज़िंदगियां, खोता राजस्व और बढ़ता माफिया नेटवर्क
राँची/हजारीबाग:- झारखंड देश का एक प्रमुख कोयला उत्पादक राज्य है। राज्य की अर्थव्यवस्था, औद्योगिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा में कोयले की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन इसी कोयले ने राज्य के कई इलाकों में एक समानांतर और खतरनाक अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है—अवैध कोयला खनन की अर्थव्यवस्था।
हजारीबाग, रामगढ़, बोकारो और उत्तरी छोटानागपुर के कई क्षेत्रों में वर्षों से चल रहा अवैध कोयला उत्खनन अब केवल राजस्व हानि का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह मानव जीवन, पर्यावरण, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है।
ताजा मामला हजारीबाग जिले के बड़कागांव क्षेत्र का है, जहां रविवार को कथित अवैध कोयला खदान में चाल धंसने और मलबा गिरने से एक मजदूर की मौत हो गई, जबकि दो अन्य घायल हो गए। घटना राउतपारा क्षेत्र के समीप अवैध उत्खनन के दौरान हुई। स्थानीय लोगों का आरोप है कि क्षेत्र में लंबे समय से अवैध खनन और कोयला तस्करी का संगठित नेटवर्क सक्रिय है।
नहीं थम रहा हादसों का सिलसिला
बड़कागांव की इस घटना से कुछ दिन पहले रामगढ़ जिले के अरगड्डा क्षेत्र में बंद खदान के समीप अवैध सुरंग में उतरे चार युवकों की ऑक्सीजन की कमी और जहरीली गैस के कारण मौत हो गई थी। वहीं, इससे पहले हजारीबाग के बरियातू-खावा क्षेत्र में अवैध खदान में नदी का पानी घुसने से तीन लोगों की जान चली गई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि बिना वैज्ञानिक योजना, सुरक्षा मानकों और तकनीकी निगरानी के संचालित अवैध खदानें कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती हैं। इनमें काम करने वाले अधिकांश मजदूर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं और मामूली आय के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं।
हजारीबाग बना अवैध कोयला कारोबार का केंद्र
पिछले कई वर्षों से हजारीबाग के बड़कागांव, गोंदलपुरा, बादम, मोहनपुर, चनारो, बुच्चाडीह, चुरचू, आंगो और केरेडारी जैसे क्षेत्र अवैध कोयला कारोबार को लेकर लगातार चर्चा में रहे हैं।
- 2021 में बड़कागांव पुलिस ने 10 अवैध खदानों पर डोजरिंग की कार्रवाई की।
- 2022 में कई जंगल क्षेत्रों में विशेष सर्च अभियान चलाया गया।
- 2024 में वन विभाग ने राउतपारा जंगल से 34 टन अवैध कोयला जब्त किया।
- 2025 में गोंदलपुरा क्षेत्र से 65 टन अवैध कोयला बरामद किया गया।
- वन विभाग ने 32 अवैध खदानों के मुहानों को बंद कराया था।
- 2022 में केवल छह महीनों के दौरान अवैध खनन से जुड़े 50 से अधिक एफआईआर दर्ज किए गए थे।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि समस्या नई नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि लगातार कार्रवाई और जब्ती के बावजूद यह कारोबार आखिर समाप्त क्यों नहीं हो पा रहा है?
अवैध खनन आखिर फल-फूल क्यों रहा है?
विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं:
- कोयले की लगातार मांग और विशाल भंडार।
- बंद या परित्यक्त खदानों की कमजोर निगरानी।
- ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी और सीमित आय के अवसर।
- संगठित परिवहन और तस्करी नेटवर्क।
- कार्रवाई और पुनरावृत्ति का लगातार चलता चक्र।
राजस्व का भारी नुकसान
अवैध खनन राज्य के राजस्व पर भी सीधा प्रहार कर रहा है। वैध खनन परियोजनाओं से सरकार को रॉयल्टी, डीएमएफटी, जीएसटी और अन्य करों के माध्यम से बड़ी आय प्राप्त होती है। इसके विपरीत अवैध रूप से निकाला गया कोयला बिना किसी कर और रॉयल्टी के बाजार तक पहुंच जाता है।
नतीजतन सरकार को करोड़ों रुपये का नुकसान होता है, जबकि अवैध नेटवर्क आर्थिक रूप से और अधिक मजबूत होता जाता है।
पर्यावरण और वन क्षेत्र भी खतरे में
अवैध खनन का असर केवल जमीन के नीचे तक सीमित नहीं है। कई मामलों में वन भूमि के भीतर सुरंगें बनाकर कोयला निकाला जाता है, जिससे मिट्टी कटाव, भू-स्खलन, भूजल स्तर में बदलाव और जैव विविधता को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और विभिन्न अदालतों में झारखंड में अवैध खनन से जुड़े कई मामले लंबित हैं। हाल के वर्षों में झारखंड हाईकोर्ट ने भी इस विषय पर प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर गंभीर टिप्पणियां की हैं।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
खनन क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि जिन क्षेत्रों में कोल ब्लॉक आवंटित हो चुके हैं, वहां पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से वैध खनन शुरू होने से रोजगार, राजस्व और निगरानी व्यवस्था में सुधार हो सकता है। हालांकि केवल नई परियोजनाएं शुरू करना पर्याप्त नहीं होगा। कानून प्रवर्तन, तकनीकी निगरानी, स्थानीय रोजगार और जवाबदेही तंत्र को भी मजबूत करना जरूरी है।
झारखंड के लिए चेतावनी
बड़कागांव, बरियातू, अरगड्डा और अन्य क्षेत्रों में हुई घटनाएं संकेत देती हैं कि अवैध खनन अब अलग-अलग घटनाओं तक सीमित नहीं है। यह एक संरचनात्मक समस्या बन चुकी है, जिसमें मजदूरों की जान जा रही है, जंगल प्रभावित हो रहे हैं, सरकार को राजस्व नुकसान हो रहा है और संगठित अवैध नेटवर्क मजबूत होते जा रहे हैं।
जब तक अवैध खनन की पूरी श्रृंखला—उत्खनन, परिवहन, भंडारण और बिक्री—पर एक साथ प्रभावी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक डोजरिंग, छापेमारी और जब्ती जैसी कार्रवाइयां केवल अस्थायी राहत ही साबित होंगी।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या अगली दुर्घटना का इंतजार किया जाएगा, या फिर इस बार अवैध खनन के खिलाफ स्थायी और व्यापक कार्रवाई होगी?









