विश्व आदिवासी दिवस पर आदिवासियत के संरक्षण, संवर्धन और विस्तार का संकल्प

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राँची, 11 अगस्त 2026:- विश्व आदिवासी दिवस के उपलक्ष्य में रांची के बगईचा, नामकोम में “आदिवासियत के संरक्षण, संवर्धन और विस्तार” विषय पर खुली चर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में झारखंड के विभिन्न जिलों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। चर्चा के दौरान आदिवासी पहचान, संस्कृति, धार्मिक स्वतंत्रता, जल-जंगल-जमीन और युवा पीढ़ी के बीच आदिवासी इतिहास एवं विरासत को लेकर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।

कार्यक्रम के शुभारंभ के बाद आयोजन समिति की ओर से सुखनाथ लोहरा ने अभियान की पृष्ठभूमि रखी। उन्होंने बताया कि आदिवासियत से जुड़े मुद्दों पर पिछले छह महीनों से राज्यभर में अभियान चलाया जा रहा है। अभियान के तहत आदिवासी समाज की स्वतंत्र पहचान, संस्कृति और अधिकारों को लेकर गांव-गांव तथा विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच चर्चा की जा रही है।

शोधार्थी आकृति लकड़ा ने कहा कि आदिवासियत पर लंबे समय से विभिन्न संगठित धार्मिक और वैचारिक प्रभावों के कारण आदिवासी युवा अपनी पहचान के सवाल से जूझ रहे हैं। उन्होंने आदिवासी युवाओं के बीच अपनी भाषा, संस्कृति, इतिहास और सामाजिक पहचान को लेकर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

आदिवासी पहचान को लेकर जताई चिंता

कवयित्री जसिंता केरकेट्टा ने अपने संबोधन में आदिवासी समाज की स्वतंत्र पहचान को लेकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठनों की विचारधारा की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि आदिवासियों की स्वतंत्र पहचान को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों को “आदिवासी” के बजाय “वनवासी” के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश उनके स्वतंत्र अस्तित्व और पहचान के सवाल से जुड़ी हुई है।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा और मनुवादी विचारधारा को लेकर भी अपनी आपत्तियां रखीं। वक्ताओं का कहना था कि “सरना-सनातन एक” जैसे नारों के माध्यम से आदिवासी समाज की स्वतंत्र धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।

अलग धार्मिक पहचान और जनगणना कोड की मांग

पूर्व मंत्री एवं सामाजिक कार्यकर्ता गीताश्री उरांव ने कहा कि आदिवासी समाज की स्वतंत्र धार्मिक व्यवस्था को अभी तक औपचारिक मान्यता और जनगणना में अलग कोड नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि सरना धर्म को अलग धार्मिक पहचान और जनगणना कोड दिए जाने की मांग लंबे समय से उठती रही है।

उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासी समाज की इस मांग का मनुवादी संगठनों द्वारा विरोध किया जाता रहा है। कार्यक्रम में सरना आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

जल, जंगल और जमीन को बताया आदिवासियत का आधार

सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला ने कहा कि आदिवासियत का मूल आधार जल, जंगल और जमीन है। उन्होंने केंद्र की भाजपा-मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और जमीन से जुड़े फैसलों का सीधा असर आदिवासी समाज के अस्तित्व और जीवनशैली पर पड़ रहा है।

शोधार्थी जयकिशन गोडसोरा ने आदिवासी सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों के संरक्षण का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि देश में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां आदिवासी सांस्कृतिक एवं धार्मिक स्थलों को दूसरे स्वरूप में परिवर्तित करने की कोशिशें हुई हैं।

वहीं जेनज़ी सुनीता बोईपाई ने शिक्षा व्यवस्था में आदिवासी इतिहास की उपेक्षा का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रमों में आदिवासी इतिहास और समाज के योगदान को पर्याप्त स्थान नहीं दिया जाता है। उन्होंने युवा पीढ़ी को अपने इतिहास और संस्कृति से जोड़ने की आवश्यकता बताई।

गांव-गांव तक चर्चा और डिजिटल माध्यम से युवाओं तक पहुंचने का निर्णय

कार्यक्रम के अंत में आदिवासियत के संरक्षण, संवर्धन और विस्तार को लेकर कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। तय किया गया कि इस विषय को राज्य के विभिन्न जिलों के गांव-गांव तक ले जाकर व्यापक चर्चा की जाएगी। इसके साथ ही डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करते हुए अधिक से अधिक युवाओं तक आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों, इतिहास, संस्कृति और पहचान की जानकारी पहुंचाने का निर्णय लिया गया।

आयोजकों के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य आदिवासी समाज के युवाओं को अपनी सांस्कृतिक एवं सामाजिक विरासत से जोड़ना और आदिवासी पहचान से जुड़े सवालों पर व्यापक संवाद स्थापित करना है।

कई संगठनों की संयुक्त भागीदारी

कार्यक्रम का आयोजन विभिन्न सामाजिक और आदिवासी संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। इनमें झारखंड जनाधिकार महासभा, आदिवासी अधिकार मंच, आदिवासी संघर्ष मोर्चा, देशाउली फाउंडेशन, जोहार, मुंडा सभा, गांव गणराज्य परिषद, विस्थापित मुक्ति वाहिनी, सराईकेला-खरसावां, आदिवासी मूलवासी अधिकार मंच बोकारो और आदिवासी समन्वय समिति खूंटी समेत अन्य संगठन शामिल रहे।

कार्यक्रम का संचालन दिनेश मुर्मू और एलिना होरो ने किया। इस अवसर पर पूर्व जज रत्नाकर भेंगरा, पंकज बंकिरा, निर्मल सिंकु, ऊषा रानी सावैंयां, प्रफुल लिंडा, संजय महली, टॉम कावला, जयां द्रेज, प्रवीर पीटर, बिल्कन डांग समेत कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे।

आयोजकों ने बताया कि चर्चा में कोल्हान क्षेत्र से हो’ आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली युवा टीम ने भी भागीदारी की और आदिवासियत के संरक्षण एवं संवर्धन से जुड़े विषयों पर अपनी बात रखी।

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Author: Ranchi Club Tv

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