करमा पर्व में दिखती है झारखंड की मिट्टी, संस्कृति और परंपरा की गहरी जड़ें
करमा पर्व को लेकर चापू टोली सरना समिति के संरक्षक राजेश तिर्की ने कहा कि आदिवासी समाज में करमा का महत्व पीढ़ियों से चला आ रहा है। उनके अनुसार उनके पूर्वज और बाप-दादा के समय से ही यहां करमा पर्व पूरी श्रद्धा और पारंपरिक तरीके से मनाया जाता रहा है। चापू टोली का अखड़ा आसपास के करीब सात गांवों के लिए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र रहा है, जहां करमा पर्व के दौरान सामूहिक उत्सव, नाच-गान और पारंपरिक कार्यक्रमों की अलग ही रौनक देखने को मिलती रही है।
राजेश तिर्की बताते हैं कि पहले करमा पर्व का उत्साह कई दिनों पहले से ही दिखाई देने लगता था। करमा पूजा से लगभग एक सप्ताह पहले ही गांवों में ढोल और नगाड़ों की गूंज सुनाई देने लगती थी। युवा, महिलाएं और ग्रामीण पारंपरिक नृत्य और गीतों के साथ पर्व की तैयारी में जुट जाते थे। अखड़ा सिर्फ नाच-गान की जगह नहीं होता था, बल्कि यही वह स्थान था जहां समाज की सांस्कृतिक पहचान और सामूहिकता भी मजबूत होती थी।
समय बदला तो करमा पर्व मनाने का तरीका भी बदल गया
समय के साथ करमा पर्व की तैयारियों और उत्सव के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया है। राजेश तिर्की के मुताबिक पहले जहां करमा से करीब एक सप्ताह पहले से ही नाच-गान शुरू हो जाता था, वहीं अब व्यस्त जीवनशैली और बदलते सामाजिक परिवेश के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है। अब कई जगहों पर करमा से दो-तीन दिन पहले ही जावा उठाने की प्रक्रिया शुरू की जाती है और इसके बाद पर्व की मुख्य तैयारियां आगे बढ़ती हैं।
यह बदलाव सिर्फ करमा पर्व तक सीमित नहीं है, बल्कि बदलते समय के साथ कई पारंपरिक त्योहारों के तौर-तरीकों में भी देखने को मिल रहा है। हालांकि, इसके बावजूद करमा पर्व की मूल भावना आज भी कायम है। लोग अपने परिवार, समाज और समुदाय के साथ मिलकर इस पर्व को मनाते हैं और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का प्रयास करते हैं।
राजेश तिर्की ने नशाखोरी को लेकर समाज से की खास अपील
करमा पर्व के मौके पर राजेश तिर्की ने आदिवासी समाज के साथ-साथ पूरे झारखंडवासियों से एक महत्वपूर्ण अपील भी की। उन्होंने कहा कि करमा पर्व खुशी, भाईचारे और सांस्कृतिक एकता का पर्व है, इसलिए इसे सकारात्मक माहौल में मनाया जाना चाहिए। उन्होंने खास तौर पर आदिवासी समाज से नशाखोरी को कम करने और इससे दूर रहने की अपील की।
राजेश तिर्की का कहना है कि आदिवासी समाज को नशे से होने वाले नुकसान को समझना होगा और आने वाली पीढ़ी को अपनी संस्कृति के साथ-साथ स्वस्थ और बेहतर सामाजिक वातावरण देना होगा। उन्होंने कहा कि करमा पर्व को मिल-जुलकर, आपसी प्रेम और भाईचारे के साथ मनाया जाए, ताकि यह त्योहार आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपरा को मजबूत करने का माध्यम बना रहे।
करमा पर्व में सिर्फ पूजा नहीं, पूरी संस्कृति की झलक
करमा पर्व के दौरान पारंपरिक गीत-संगीत, नृत्य, अखड़ा और सामूहिक आयोजन झारखंड की लोक संस्कृति की जीवंत तस्वीर पेश करते हैं। यह पर्व प्रकृति और समाज के बीच संबंध को भी सामने लाता है। भाई-बहन के रिश्ते और सामुदायिक सहभागिता से जुड़ी परंपराएं इस पर्व को और खास बनाती हैं। यही वजह है कि करमा सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक स्मृति और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं का हिस्सा है।
चापू टोली सरना समिति के संरक्षक राजेश तिर्की की बातों में एक तरफ जहां करमा पर्व की पुरानी परंपराओं की झलक दिखाई देती है, वहीं दूसरी तरफ बदलते समय को लेकर चिंता भी नजर आती है। उनका संदेश साफ है कि समय बदले, उत्सव का तरीका बदले, लेकिन अपनी संस्कृति, परंपरा, भाईचारे और सामाजिक मूल्यों को कमजोर नहीं होने देना चाहिए।
करमा पर्व का संदेश—परंपरा भी बचाएं, समाज भी मजबूत बनाएं
करमा पर्व झारखंड की आदिवासी संस्कृति की उन मजबूत कड़ियों में से एक है, जो समाज को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं। ढोल-नगाड़ों की पारंपरिक गूंज हो या अखड़ा में सामूहिक नृत्य, जावा की परंपरा हो या भाई-बहन के रिश्ते का भाव—हर पहलू इस पर्व को खास बनाता है। ऐसे में करमा पर्व सिर्फ उत्सव मनाने का अवसर नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का भी समय है।
राजेश तिर्की ने तमाम झारखंडवासियों और आदिवासी समाज से अपील की कि करमा पर्व को प्रेम, भाईचारे और आपसी एकता के साथ मनाएं, नशाखोरी से दूर रहें और अपनी समृद्ध संस्कृति एवं परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक मजबूती से पहुंचाएं।









