राँची:- झारखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं में करमा पर्व का विशेष स्थान है। रांची जिले में करमा पूजा 2026 को लेकर तैयारियां अब अंतिम दौर में पहुंच चुकी हैं। गांवों और स्थानीय क्षेत्रों में करम डाली की पूजा को लेकर उत्साह का माहौल है। कई वर्षों से यहां करमा पूजा उत्सव पारंपरिक तरीके से मनाया जा रहा है और इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास लगातार जारी है।
करमा पर्व की एक खास पहचान इसका प्रकृति से जुड़ाव है। करम डाली को विशेष महत्व देते हुए उसकी पूजा की जाती है। इस परंपरा के माध्यम से प्रकृति, पेड़-पौधों और पर्यावरण के प्रति सम्मान का संदेश भी समाज तक पहुंचता है। झारखंड जैसे प्राकृतिक संपदा से समृद्ध राज्य में यह पर्व लोगों को अपनी जड़ों और प्राकृतिक परिवेश से जोड़ने का काम करता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार करमा पूजा की परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है। हर वर्ष भाद्रपद महीने की एकादशी के अवसर पर करमा पर्व को उत्साह के साथ मनाया जाता है। गांव के अखड़ा और आंगन में करम डाली स्थापित कर पारंपरिक विधि-विधान से पूजा की जाती है। इसके बाद गीत-संगीत और सामूहिक आयोजन के माध्यम से लोग इस पर्व की खुशियां साझा करते हैं।
करमा पर्व से जुड़ी लोककथा भी इसकी सांस्कृतिक पहचान को और समृद्ध बनाती है। लोकमान्यता के अनुसार सतयुग में एक वृद्ध दंपती धन-दौलत से संपन्न होने के बावजूद संतान नहीं होने के कारण दुखी था। मान्यता है कि उन्हें ईश्वरीय संकेत मिला कि वे करम डाली लाकर विधि-विधान से उसकी पूजा करें। दंपती ने करम डाली की पूजा की और इसके बाद उन्हें दो पुत्रों की प्राप्ति हुई, जिनका नाम करमा और धर्मा रखा गया।
लोककथा आगे बताती है कि समय के साथ दोनों भाइयों के जीवन में अलग-अलग परिस्थितियां आईं। कहानी में करम डाली के प्रति सम्मान, अच्छे कर्म और प्रकृति की सेवा को जीवन में सुख-समृद्धि से जोड़ा गया है। वहीं अहंकार और परंपरा की उपेक्षा को नकारात्मक परिणामों से जोड़ा गया है। इसी लोककथा के माध्यम से करमा पर्व समाज को यह संदेश देता है कि इंसान को अच्छे कर्म करने चाहिए, प्रकृति का सम्मान करना चाहिए और किसी के प्रति बुरा भाव नहीं रखना चाहिए।
रांची जिले के बांलगढ़ी निवासी मिथिलेश खलखो ने बताया कि करमा पूजा उनके लिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूर्वजों से मिली संस्कृति और परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम है। उन्होंने कहा कि समय बदलने के बावजूद करमा पर्व की परंपरा और इसका संदेश आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार यह पर्व भाई-बहन के प्रेम के साथ-साथ प्रकृति और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भी संदेश देता है।
करमा पूजा 2026 के आयोजन को लेकर स्थानीय लोगों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। पारंपरिक गीतों, पूजा-अर्चना और सामूहिक सहभागिता के बीच यह पर्व झारखंड की लोक संस्कृति की खूबसूरत तस्वीर पेश कर रहा है। करमा पर्व की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यह परिवार, समाज और प्रकृति—तीनों को एक साथ जोड़ता है।
करमा पर्व के माध्यम से झारखंड की संस्कृति की वह परंपरा सामने आती है, जिसमें प्रकृति को सम्मान देने, रिश्तों को मजबूत करने और अच्छे कर्मों को जीवन का आधार बनाने की सीख दी जाती है। यही संदेश इस पर्व को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनाए हुए है। स्थानीय लोगों ने सभी झारखंडवासियों को करमा पूजा की शुभकामनाएं देते हुए जय करम, जय धर्म, जोहार, जय हिंद और जय झारखंड का संदेश दिया।









