राँची:- प्रदेश कांग्रेस महासचिव आलोक कुमार दूबे ने भाजपा नेता द्वारा कांग्रेस पर आदिवासी आरक्षित सीटों को लेकर लगाए गए आरोपों पर तीखा पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि भाजपा नेता पहले इतिहास और संविधान पढ़ें, उसके बाद कांग्रेस पर आरोप लगाएं। आलोक कुमार दूबे के अनुसार, आजादी के बाद से आदिवासी समाज के संवैधानिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक अधिकारों को मजबूत करने में कांग्रेस की सरकारों की निर्णायक भूमिका रही है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस की सरकारों के दौरान आदिवासी अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में कई महत्वपूर्ण कानून और नीतियां लागू की गईं। इनमें अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम यानी PESA, 1996, वन अधिकार अधिनियम, 2006 तथा भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्व्यवस्थापन कानून, 2013 प्रमुख हैं।
वन अधिकार और ग्रामसभा के अधिकारों का किया उल्लेख
आलोक कुमार दूबे ने कहा कि वन अधिकार कानून ने जंगल पर निर्भर आदिवासी समुदायों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को कानूनी मान्यता दी। वहीं PESA ने अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा की भूमिका और अधिकारों को मजबूत करने का काम किया। उनके मुताबिक, ये केवल राजनीतिक घोषणाएं नहीं बल्कि कानून के रूप में आदिवासी समाज को मिले अधिकार हैं।
आजादी के बाद आदिवासी समाज के लिए कांग्रेस की 10 महत्वपूर्ण पहल
1. संविधान में आदिवासी संरक्षण
अनुसूचित जनजातियों की पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अनुसूचित क्षेत्रों की विशेष सुरक्षा के लिए संविधान में विशेष प्रावधान किए गए।
2. पांचवीं अनुसूची
अनुसूचित क्षेत्रों और आदिवासी समुदायों के प्रशासन तथा उनके हितों की रक्षा के लिए विशेष संवैधानिक व्यवस्था की गई।
3. संसद और विधानसभा में ST आरक्षण
आदिवासी समाज को लोकतांत्रिक संस्थाओं में राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था की गई।
4. SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989
SC/ST समुदायों को जातीय एवं सामाजिक अत्याचारों से विशेष कानूनी संरक्षण देने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कानून है।
5. PESA अधिनियम, 1996
अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा को मजबूत किया गया और स्थानीय संसाधनों एवं विकास से जुड़े निर्णयों में आदिवासी समुदाय की भूमिका को कानूनी आधार मिला।
6. वन अधिकार अधिनियम, 2006
पीढ़ियों से जंगलों पर निर्भर आदिवासी एवं अन्य परंपरागत वनवासी समुदायों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को कानूनी मान्यता मिली।
7. भूमि अधिग्रहण कानून, 2013
भूमि अधिग्रहण में मुआवजा, पारदर्शिता, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन से जुड़े अधिकारों को मजबूत करने की व्यवस्था की गई।
8. आदिवासी कल्याण के लिए संस्थागत व्यवस्था
जनजातीय कार्य मंत्रालय तथा अनुसूचित जनजातियों के कल्याण एवं विकास के लिए केंद्र और राज्यों में विशेष संस्थागत ढांचे को मजबूती दी गई।
9. शिक्षा और छात्रवृत्ति पर जोर
आदिवासी विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, आवासीय शिक्षा और उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने के लिए विभिन्न योजनाओं का विस्तार किया गया।
10. आदिवासी क्षेत्रों के विकास पर विशेष ध्यान
जनजातीय उप-योजना सहित लक्षित विकास कार्यक्रमों के माध्यम से आदिवासी बहुल क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं को बढ़ाने की दिशा में काम किया गया।
“भाजपा एक लाइन में जवाब दे—ST सीटें घटेंगी या नहीं?”
आलोक कुमार दूबे ने वर्ष 2008 के परिसीमन को लेकर कांग्रेस पर लगाए जा रहे आरोपों पर कहा कि परिसीमन एक संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि इसे किसी राजनीतिक दल की मनमर्जी के आधार पर नहीं किया जाता।
उन्होंने भाजपा को सीधी चुनौती देते हुए कहा, “बहुत भाषण हो गया। भाजपा सिर्फ एक लाइन में जवाब दे—भविष्य में झारखंड में आदिवासियों की आरक्षित विधानसभा सीटें घटेंगी या नहीं?”
आलोक कुमार दूबे ने सवाल उठाया कि यदि भाजपा आदिवासी समाज की इतनी ही हितैषी है तो वह इस सवाल का स्पष्ट जवाब देने से क्यों बच रही है।
“झारखंड के अस्तित्व को नकारने वाले आज आदिवासी अस्मिता की बात कर रहे”
अलग झारखंड राज्य के सवाल पर आलोक कुमार दूबे ने कहा कि भाजपा आज झारखंड निर्माण का श्रेय लेने की कोशिश करती है, लेकिन जनता इतिहास नहीं भूली है। उन्होंने कहा कि झारखंड आंदोलन के दौरान भाजपा की ओर से ‘वनांचल’ की अवधारणा सामने रखी जाती थी।
उन्होंने कहा कि आज वही लोग झारखंड की अस्मिता और आदिवासी अधिकारों के सबसे बड़े पैरोकार बनने का दावा कर रहे हैं। उन्होंने सवाल किया कि जब झारखंड की अलग पहचान की लड़ाई चल रही थी, तब भाजपा का वास्तविक राजनीतिक स्टैंड क्या था।
आलोक कुमार दूबे ने कहा कि झारखंड केवल खनिज संपदा का प्रदेश नहीं है, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता, संस्कृति, भाषा, जल-जंगल-जमीन और संघर्ष की धरती है।
विशाल आदिवासी रैली से भाजपा में बौखलाहट : दूबे
उन्होंने दावा किया कि आदिवासियों की विशाल रैली ने भाजपा नेताओं की बेचैनी बढ़ा दी है। उनके मुताबिक, इसी वजह से भाजपा नेता कभी परिसीमन तो कभी झारखंड निर्माण के इतिहास को लेकर जनता को भ्रमित करने की कोशिश कर रहे हैं।
आलोक कुमार दूबे ने कहा कि आदिवासी समाज अब सिर्फ भाषण सुनने वाला समाज नहीं है। वह अपने संवैधानिक अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, जल-जंगल-जमीन और सम्मान के सवाल पर जवाब मांग रहा है।
उन्होंने भाजपा से कहा कि इतिहास को तोड़-मरोड़कर आदिवासी समाज को गुमराह करने की कोशिश बंद करे और पहले यह स्पष्ट करे कि ST आरक्षित सीटों, PESA, वन अधिकार और आदिवासी स्वशासन के सवाल पर उसकी वास्तविक नीति क्या है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस आदिवासी समाज के अधिकारों की लड़ाई कल भी लड़ती थी, आज भी लड़ रही है और आगे भी मजबूती से लड़ती रहेगी।









